खोए हुए खज़ाने की फिर से खोज
उत्तराखंड की पहाड़ियों की सीढ़ीदार खेती में पीढ़ियों से एक अनमोल अनाज बोया और बचाया जाता रहा है — मंडुआ। यह पारंपरिक बाजरा न सिर्फ़ अपनी पोषण क्षमता, स्थायित्व और सांस्कृतिक महत्व के लिए जाना जाता है, बल्कि यह इस प्रदेश की पहचान और इतिहास का हिस्सा भी है। समय की कसौटी पर खरा उतरने वाला यह अनाज हाल ही में एक बड़ी उपलब्धि तक पहुँचा है — इसे किसान किस्म (Farmer’s Variety) के रूप में कानूनी मान्यता मिली है। यह कदम किसानों के अधिकारों और हमारी सांस्कृतिक धरोहर दोनों को सुरक्षित करने की दिशा में बेहद अहम है।
किसान किस्म” का क्या अर्थ है?
जब किसी फसल को किसान किस्म के रूप में मान्यता मिलती है और उसे भारत के पादप किस्म एवं कृषक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 2001 के अंतर्गत संरक्षित किया जाता है, तो यह उस मेहनत को स्वीकार करता है जो किसानों ने अपनी परंपरागत जानकारी से बीजों को बचाने और संवारने में लगाई है।
इस मान्यता के बाद किसानों को यह अधिकार मिलता है कि वे अपने बीजों को:
- बचा सकें,
- दोबारा बो सकें,
- आपस में बाँट सकें,
- और बेच भी सकें।
इससे न सिर्फ़ किसान अपनी आर्थिक स्वतंत्रता बरकरार रखते हैं, बल्कि कृषि-जैव विविधता (agrobiodiversity) को भी सुरक्षित किया जाता है। कानूनी मान्यता केवल एक औपचारिक शब्द नहीं, बल्कि हमारी कृषि-संस्कृति की परतदार सुरक्षा है।
क्यों है यह इतना अहम?
सांस्कृतिक गौरव और संरक्षण
मंडुआ उत्तराखंड की आहार संस्कृति और परंपरा का हिस्सा है। कानूनी मान्यता मिलने से यह केवल खेतों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसे व्यापक स्तर पर मूल्य मिलता है।
किसानों का सशक्तिकरण
अब यह मान्यता सुनिश्चित करती है कि इस अनाज के असली संरक्षक — स्थानीय किसान — ही इसके सच्चे हकदार रहें। उनकी पीढ़ियों की मेहनत और ज्ञान को अब औपचारिक रूप से सम्मान मिला है।
टिकाऊ खेती की ओर बढ़ता कदम
जलवायु परिवर्तन के दौर में मंडुआ जैसी पारंपरिक और सहनशील फसलों को पहचान मिलना न सिर्फ़ खेती को टिकाऊ बनाता है, बल्कि जैव विविधता और पर्यावरण संतुलन को भी मजबूत करता है।
उत्तराखंड में बाजरे का पुनर्जागरण
मंडुआ की कहानी, उत्तराखंड में बाजरे के व्यापक पुनरुत्थान से अलग नहीं है।
- नीतिगत समर्थन और कीमत में बढ़ोतरी
राज्य सरकार ने मंडुआ का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) 2021–22 में ₹2,500 प्रति क्विंटल से बढ़ाकर 2024–25 में ₹4,200 कर दिया है। इससे किसानों का रुझान फिर से बाजरा उगाने की ओर बढ़ा है। - बुनियादी ढाँचा और उपभोक्ता तक पहुँच
2020–21 में जहाँ मंडुआ के केवल 23 खरीद केंद्र थे, वहीं 2024–25 में यह संख्या बढ़कर 270 हो गई है। इतना ही नहीं, मंडुआ को अब सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS), मध्यान्ह भोजन योजना और आंगनवाड़ी पोषण कार्यक्रमों में भी शामिल किया जा रहा है। - दीर्घकालिक नीति पहल
राज्य की बाजरा नीति 2025–26 के तहत पहले चरण में 30,000 हेक्टेयर और फिर दूसरे चरण में 40,000 हेक्टेयर भूमि पर मंडुआ सहित अन्य बाजरों की खेती को बढ़ावा दिया जाएगा। इसके लिए किसानों को बीज और जैव उर्वरक पर सब्सिडी भी दी जा रही है।
विरासत और अवसर का संगम
झुमकिया मंडुआ को मिली यह मान्यता केवल एक औपचारिक सम्मान नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक संरक्षण, किसानों के अधिकार और टिकाऊ कृषि का संगम है।
अब यह अनाज स्थानीय ज्ञान से संरक्षित विरासत बन गया है — सरकार के समर्थन और किसानों की मेहनत से यह सिर्फ़ पहाड़ों की स्मृति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि स्वास्थ्य, आजीविका और संस्कृति के केंद्र में अपनी मजबूत जगह बनाएगा।
यह पूरी प्रक्रिया हमें यह याद दिलाती है कि कभी-कभी परंपराओं को फिर से जीवन देने के लिए केवल एक सही पहचान और सहयोगी नीति ही काफी होती है।